(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि - ब्रह्महत्या आदि) पापों का यह (११।७१-२४५) प्रायश्चित्त विधिपूर्वक (मैंने) कहा, यहाँ से आगे (११।२४७-२६४) रहस्यों (गुप्त पापों) के प्रायश्चित्त को (आप लोग) सुनें।
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