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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 238
महापातकिनश्चैव शेषाश्चाकार्यकारिणः । तपसैव सुतप्तेन मुच्यन्ते किल्बिषात्ततः ।।
इस कारण (११।२३३-२३७) महापातकी (ब्रह्महत्या आदि करनेवाले ११।५३) तथा शेष अकार्यकारी (गोहत्या आदि उपपातक करनेवाले ११।५८-६५) अच्छी तरह किये गये तप के द्वारा ही पाप से छूट जाते हैं।
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