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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 237
यहुस्तरं यद्दुरापं यहुर्ग यच्च दुष्करम्‌ । सर्वन्तत्‌ तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्‌ ।।
जो दुस्तर (कठिनता से पार होने योग्य ग्रहबाधा आदि हैं), जो दुर्लभ (कठिनता से प्राप्तं होने योग्य-यथा क्षत्रिय होकर भी विश्वामित्र का ब्राह्मण होना आदि है, जो दुर्गम (कठिनता से चलने योग्य सुमेरु-शिखर आदि) है, जो दुष्कर (कठिनता से करने योग्य गौ, भूमि, धन आदि का अपरमित मात्रा में दान करना आदि) है, वह तप से सिद्ध हो सकता है; क्योंकि तप उलङ्घन के योग्य नहीं होता है।
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