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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 233
तपोमूलमिदं सर्व दैवमानुषकं सुखम्‌ । तपोमध्यं बुधैः प्रोक्तं तपोन्तं वेददर्शिभिः ।।
देवों तथा मनुष्यों के सुख की जड़ तप ही है, वह सुख तप से ही स्थिर रहता है और उस सुख का अन्तिम लक्ष्य तप ही है; ऐसा वेद (मन्त्रों) के द्रष्टा महर्षियों का कथन है।
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