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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 232
यस्मिन्कर्मण्यस्य कृते मनसः स्यादलाघवम्‌ । तस्मिंस्तावत्तपः कुर्याद्यावत्तुष्टिकरं भवेत्‌ ।।
पापी मनुष्य का मन जिस प्रायश्चित्त को करने पर हल्का (सुप्रसन्न “इतना व्रत नियमादि प्रायश्चित्त करने से मेरा पाप अवश्य दूर हो गया होगा” इस प्रकार दृढ़ आत्म-विश्चास) न हो, तब तक वह व्रत नियम आदि तप का आचरण करता रहे।
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