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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 229
कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात्पापात्प्रमुच्यते । नैवं कुर्या पुनरिति निवृत्त्या पूयते तु सः ।।
पापी मनुष्य पाप कर्म करके उसके लिए अनुताप (पछतावा) कर पाप से छूट जाता है तथा 'फिर मैं ऐसा निन्दित कर्म नहीं करूंगा’ इस प्रकार सङ्कल्परूप से उसका त्यागकर वह पवित्र हो जाता है।
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