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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 227
यथा यथा नरोऽ धर्म स्वयं कृत्वाऽनुभाषते । तथा तथा त्वचेवाहिस्तेनाधर्मेण मुच्यते ।।
पापी मनुष्य पाप करके जैसे-जैसे अपने पाप को लोगों से कहता है, वैसे-वैसे काँचली साँप के समान वह मनुष्य उस पाप से छूटता (अलग होता) उजाता है।
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