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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 226
ख्यापनेनानुतापेन तपसाऽध्ययनेन च । पापकृन्मुच्यते पापात्तथा दानेन चापदि ।।
अपने पाप को सर्वसाधारण में कहने से, पश्चात्ताप (“ऐसे कुकर्म में प्रवृत्त होनेवाले मुझ पापी को बार-बार धिक्कार है” इत्यादि प्रकार से निरन्तर पछतावा) करने से, कठिन तपश्चरण से, (वेद आदि के) अध्ययन (पाठ, जप आदि) से और (इन सब कार्यो की शक्ति नहीं रहने पर) दान करने से पापी मनुष्य पाप से छूट जाता है।
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