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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 223
स्थानासनाभ्यां विहरेदशक्तोऽधः शयीत वा । ब्रह्मचारी व्रती च स्यादगुरुदेवद्विजार्चकः ।।
और रात तथा दिन में खड़ा रहे, टहलता रहे या बैठे (किन्तु सोवे (लेटे) नहीं) अथवा इतनी शक्ति नहीं रहने पर भूमि पर सोवे, ब्रह्मचारी तथा व्रती रहे और गुरु, देव तथा ब्राह्मणों की पूजा (आदर-सत्कार) करे।
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