स्थानासनाभ्यां विहरेदशक्तोऽधः शयीत वा ।
ब्रह्मचारी व्रती च स्यादगुरुदेवद्विजार्चकः ।।
और रात तथा दिन में खड़ा रहे, टहलता रहे या बैठे (किन्तु सोवे (लेटे) नहीं) अथवा इतनी शक्ति नहीं रहने पर भूमि पर सोवे, ब्रह्मचारी तथा व्रती रहे और गुरु, देव तथा ब्राह्मणों की पूजा (आदर-सत्कार) करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।