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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 222
त्रिरह्नस्त्िर्निशायां च सवासा जलमाविशेत्‌ । सतरीशूद्रपतितांश्चैव नाभिभाषेत कर्हिचित्‌ ।।
पिपीलिकामध्य (११।२ १५) तथा यवमध्य (११।२१६) नामक चान्द्रायण व्रत को करता हुआ दिन तथा रात्रि में तीन-तीन बार सवस्त स्नान करे तथा व्रत पूर्ण होने तक स्त्री, शूद्र तथा पतितों के साथ कभी बातचीत न करे।
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