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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 219
यथाकथञ्चित्पिण्डानां तिस्रोऽशीतीः समाहितः । मासेनाशनन्हविष्यस्य चन्द्रस्यैति सलोकताम्‌ ।।
सावधानचित्त द्विज (नीवारादि) हविष्यात्र के तीन अस्सी अर्थात्‌ दो सौ चालिस ग्रासों की एक मास में जिस किसी प्रकार (कभी १०, कभी ५ तो कभी १४ ग्रास खाकर और कभी उपवास कर एक मास में कुल २४० ग्रास) भोजन कर चन्द्रलोक को प्राप्त करता है।
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