यवमध्य चान्द्रायण व्रत को करता हुआ व्रती (त्रिकाल स्नान करता हुआ) शुक्लपक्ष को पहले तथा कृष्णपक्ष को बाद में करके इसी समस्त विधि (११।२१५) को करे।
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