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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 201
विनाऽद्धिरप्सु वाऽप्यार्त्तः शारीरं सन्निषेव्य च । सचैलो बहिराप्लुत्य गामालभ्य विशुध्यति ।।
मल-मूत्र त्याग करने के वेग से युक्त मनुष्य जलरहित हो (पास में जल नहीं ले) कर या जल में मल मूत्र का त्याग (पेशाब या टट्टी) करके वस्त्ररहित स्नान कर गाँव के बाहर में गौ का स्पर्शकर मनुष्य शुद्ध होता है।
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