ब्रात्यानां याजनं कृत्वा परेषामन्त्यकर्म च ।
अभिचारमहीनं च त्रिभिः कृच्छेर्व्यपोहति ।।
व्रतियों (२।३९) का यज्ञ कराकर, (पिता, माता, गुरु आदि से) अन्य लोगों का और्ध्वदेहिक दाह-श्राद्धादि कर्म करके अभिचार (मारण, मोहन, उच्चाटनादि कर्म) और अहीन अर्थात् यागविशेष करके (द्विज) तीन कृच्छर (प्राजापत्य ११।२१०) ब्रत करके शुद्ध होता है।
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