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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 195
सत्यमुक्त्वा तु विप्रेषु विकिरेद्यवसं गवाम्‌ । गोभिः प्रवर्तिते तीर्थे कुर्युस्तस्य परिग्रहम्‌ ।।
फिर हाँ ("पुनः निन्दित दान नहीं लूँगा”) ऐसा प्रश्‍नकर्त्ता ब्राह्मणों से कहकर यह प्रायश्चित्तकर्त्ता ब्राह्मण गौओं के लिए घास डाल दे तथा गौओं के घास खाने से पवित्र तीर्थरूप उस भूमि में ब्राह्मण लोग उस ब्राह्मण को अपने व्यवहार में ग्रहण करना स्वीकार कर लें।
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