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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 192
यद्गर्हितेनार्जयन्ति कर्मणा ब्राह्मणा धनम्‌ । तस्योत्सर्गेण शुध्यन्ति जप्येन तपसैव च ।।
ब्राह्मण लोग जिस निषिद्ध (अग्राह्य दानादि लेना, व्रात्यो (२।३९) का यज्ञ कराना, दूसरों का श्राद्ध कराना, मारण मोहन-उच्चाटनादि अभिचार कर्म करना आदि) कर्मो के आचरण से धन का उपार्जन करते हैं, उस धन का त्याग तथा आगे (११।१९४१९७) कहे जाने वाले जप और तप से वे ब्राह्मण शुद्ध (दोषरहित) होते हैं।
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