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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 190
येषां द्विजानां सावित्री नानूच्येत यथाविधि । तांश्चारयित्वा त्रीन्कृच्छान्यथाविध्युपनाययेत्‌ ।।
जिन द्विजों का यज्ञोपवीत संस्कार अनुकल्पित समय (ब्राह्मण का १६वें क्षत्रिय का २२वें तथा वैश्य का २४वें वर्ष) में भी नहीं हुआ हो, उनसे तीन कृच्छर (प्राजापत्य ११।११०) व्रत कराकर विधिपूर्वक उसका यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिये।
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