प्रायश्चित्त नहीं किये हुए पापियों (पतितों) के साथ कुछ भी व्यवहार (लेन-देन, भोजन, सहवास आदि) नहीं करे, तथा जिस पापी ने प्रायश्चित्त कर लिया है, उसकी कभी भी (पूर्व दुष्कर्मों के सम्बन्ध में) निन्दा न करे।
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