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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 185
प्रायक्चित्ते तु चरिते पूर्णकुम्भमपां नवम्‌ । तेनैव सार्ध प्रास्येयुः स्नात्वा पुण्ये जलाशये ।।
पतित के प्रायश्चित्त कर लेने पर उसके सपिण्ड तथा समानोदक बन्धु उसके साथ शुद्ध जलाशय (तडाग, नदी आदि) में स्नानकर जल से पूर्ण नये घड़े को (उस जलाशय में) छोड़ दें।
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