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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 184
ज्येष्ठता च निवर्तेत ज्येष्ठावाप्यं च यद्वसु । ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान्गुणतोऽधिकः ।।
यदि वह महापातकी ज्येष्ठ (बड़ा भाई) हो तो उसकी ज्येष्ठता नहीं रहती (अत: उसके लिए अभ्युत्थानादि न करे) और ज्येष्ठ के लिए प्राप्य पैतृक धन में से भाग तथा 'उद्धार' (९।११२-११४ अतिरिक्त हिस्सा) उसे नहीं मिलता, किन्तु ज्येष्ठ होने के कारण मिलने वाला “उद्धार” भाग उस (महापातकी) का गुणवान्‌ छोटा भाई प्राप्त करता है।
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