निवर्तेरंश्च तस्मात्तु सम्भाषणसहासने ।
दायाद्यस्य प्रदानं च यात्रा चैव हि लौकिकी ।।
उस महापातकी के साथ बातचीत करना, बैठना, हिस्सा लेना, देना तथा लोकव्यवहार (वार्षिक आदि कार्यो में निमन्त्रित करना आदि) को छोड़ दे।
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