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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 182
दासी घटमपां पूर्ण पर्यस्येत्रेतवत्पदा । अहोरात्रमुपासीरन्नशौचं बान्धवैः सह ।।
उन सपिण्डों तथा समानोदक बान्धवों से प्रेरित दासी जल से भरे तथा काम में लाये गये अर्थात्‌ पुराने घड़े को दक्षिण दिशा की ओर मुखकर पैर से ठोकर मार दे (जिससे घड़े का पानी गिर जाय), फिर वे सपिण्ड समानोदकों के साथ दिनरात अशौच मनावें।
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