पतितस्योदकं कार्य सपिण्डैर्बान्धवैर्बहिः ।
निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञात्यृत्विग्गुरुसन्निधौ ।।
महापातकी (११।५४) के जीवित रहने पर ही उसके निमित्त जलदान (तर्पण) को (अग्रिम श्लोकोक्त विधि से) गाँव के बाहर जाति, ऋत्विक् तथा गुरुओ के समक्ष में निन्दित दिन (नवमी तिथि) में सायङ्काल करे।
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