यो येन पतितेनैषां संसर्ग याति मानव: ।
स तस्यैव व्रतं कुयत्तित्संसर्गविशुद्धये ।।
इन पतितों में से जिस पतित के साथ जो मनुष्य संसर्ग करे, वह उन्हीं पतितों के पाप के (चतुर्थांश! कर्म) प्रायश्चित्त उस संसर्गजन्य पाप की शुद्धि के लिए करे।
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