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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 18
योऽ साधुभ्योऽ थमादाय साधुभ्यः संप्रयच्छति । स कृत्वा प्लवमात्मानं संतारयति तावुभौ ।।
जो मनुष्य (उक्त निमित्त (११।११-१७ के आने पर) दुष्टों से धन लाकर सज्जनों (यज्ञाङ्गसाधक ऋत्विक्‌ आदि) के लिए देता है, वह अपने को नाव बनाकर उन दोनों को (धन वाले के धन को पुण्य कर्म में लगाने से उसके पुण्य को बढ़ाकर धन-स्वामी को तथा दान लेने वाले के यज्ञादि को पूरा होने से उसकी आपत्ति को दूर कर दान लेने वाले को, दुःख से) पार कर देता है।
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