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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 177
यत्करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनाद्द्विजः । तद्धैक्षभुग्जपन्नित्यं त्रिभिर्वषैरव्यपोहति ।।
द्विज एक रात चाण्डाली-सम्भोग करके जो पाप उपार्जित करता है, उसे वह तीन वर्ष तक भिक्षा माँगकर भोजन तथा गायत्री जप से नष्ट करता है।
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