ब्राह्मणस्वं न हर्तव्यं क्षत्रियेण कदाचन ।
दस्युनिष्क्रिययोस्तु स्वमजीवन्हर्तुमर्हति ।।
इन आपत्तियों (११।११-१६) के उपस्थित होने पर भी क्षत्रिय ब्राह्मण के धन को कदापि नहीं लावे; किन्तु निषिद्ध (चोरी आदि) कार्य करने वाले तथा विहित (यज्ञ, वेदाध्ययन, दानादि) कार्य नहीं करने वाले ब्राह्मण के भी धन को क्षत्रिय लावे।
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