(भूगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) द्विज इन (११।१६१-१६७) ब्रतों से चोरी के पाप को दूर करे और अगम्यागमन (सम्भोग के अयोग्य स्त्री के साथ सम्भोग करने) के पाप को इन (११।१६९-१७६) व्रतो (प्रायश्चित्तो) से दूर करे।
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