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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 163
द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वाऽ न्यवेश्मनि । चरेत्सान्तपनं कृच्छं ततन्निर्यात्यात्मशुद्धये ।।
दूसरे के घर से थोड़े मूल्य (तथा प्रयोजन) की वस्तु को चुराकर अपनी शुद्धि के लिए चुरायी हुई वस्तु उसके स्वामी को देकर सान्तपन कृच्छर (११।२११) ब्रत करे।
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