मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य च ।
कूपवापीजलानां च शुद्धिश्चांद्रायणं स्मृतम् ।।
मनुष्य, स्त्री, खेत, घर, कुएँ तथा बावड़ी (अहरा, पोखरा आदि सिंचाई के साधनभूत जलाशय) के सम्पूर्ण पानी को चोरी करने पर (मनु आदि महर्षियों ने) चान्द्रायण (११।२१५-२१९) व्रत से शुद्धि बतलायी है।
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