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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 154
शुष्काणि भुक्त्वा मांसानि भौमानि कवकानि च । अज्ञातं चैव सूनास्थमेतदेव व्रतं चरेत्‌ ।।
सूखा मांस, भूमि पर उत्पन्न कवक (छत्राक यह वर्षा में भूमि या पेड़ आदि पर श्वेत-कृष्ण वर्ण का छत्राकार उत्पन्न होता है), आज्ञात मांस (यह हरिण आदि भक्ष्य जीव का मांस हे या अभक्ष्य गधे आदि का, ऐसा नहीं मालूम हुआ मांस) और कसाई खाने का वधिक के यहाँ का मांस खाकर द्विज इसी चान्द्रायण व्रत (११।२१५२१९) को करे।
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