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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 153
विड्वराहखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः । प्राश्य मूत्रपुरीषाणि द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्‌ ।।
ग्राम्य सूकर, गधा, ऊंट, सियार, वानर, कौवा; इनके मल-मूत्र को खाकर द्विज चान्द्रायण (११।२१५-२१९) व्रत करे।
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