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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 152
शुक्तानि च कषायांश्च पीत्वा मेध्यान्यपि द्विजः । तावद्धवत्यप्रयतो यावत्तन्न व्रजत्यधः ।।
पवित्र भी शुक्त तथा (उबाले हुए बहेडेद्व हरे आदि) कसैले पदार्थ को पीकर द्विज तब तक अपवित्र रहता है, जब तक ये पदार्थ पच नहीं जाते।
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