वपनं मेखलादण्डो भैक्ष्यचर्या व्रतानि च ।
निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनः संस्कारकर्मणि ।।
द्विजों के पुन:संस्कार करने में मुण्डन, मेखला, (पलाश आदि का) दण्ड, भिक्षा माँगना, (मधु मांस स्त्रीत्यागादि) ब्रत नहीं होते हैं।
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