आज्ञानात्प्राशय विण्मूत्रं सुरासंस्पृष्टमेवच ।
पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ।।
(मनुष्य के) मल, मूत्र या मद्य से, स्पृष्ट अन्नादि रस को अज्ञानपूर्वक खाकर तीनों वर्ण के द्विज फिर से (यज्ञोपवीत) संस्कार करने (११।१५०) के योग्य होते हैं।
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