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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 148
ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमाघ्राय सोमपः । प्राणानप्सु त्रिरायम्य घृतं प्राश्य विशुध्यति ।।
सोमयाजी (सोमयज्ञ करनेवाला) मद्यपायी ब्राह्मण के मुख की गन्ध सूँघकर जल में तीन बार प्राणायाम कर घी का भक्षण करने से शुद्ध होता है।
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