स्पृष्ट्वा दत्वा च मदिरां विधिवत्मतिगृह्य च ।
शूद्रोच्छिष्टाश्च च पीत्वाऽऽपः कुशवारि पिबेत्र्यहम् ।।
मदिरा को छूकर, देखकर, ('स्वस्त' कथनपूर्वक) विधिवत् दान लेकर और शूद्र का जूठा पानी पीकर तीन दिन तक कुश (को उबालकर उस) का पानी पीवे।
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