द्विज अज्ञान से वारुणी को पीकर पुनः संस्कार (११।१४९) से ही शुद्ध (पाप रहित) होता है तथा ज्ञान से पीकर मरकर ही शुद्ध होता है, ऐसी (शास्त्र की) मर्यादा है।
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