आदाननित्याच्चादातुराहरेदप्रयच्छतः ।
तथा यशोऽस्य प्रथते धर्मश्चैव प्रवर्धते ।।
सर्वदा दान आदि का धन लेने वाला तथा इष्टपूर्त और दान आदि नहीं करनेवाला (ब्राह्मण) यज्ञ के दो या तीन अङ्गों की पूर्णता के लिए यदि याचना करने पर भी यजमान (यज्ञकर्ता) को धन नहीं दे तो यजमान उनको (बलात्कार या चोरी से) लावे, ऐसा कहने से धन लाने वाले यज्ञकर्ता की ख्याति और धर्म की वृद्धि भी होती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।