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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 14
आदाननित्याच्चादातुराहरेदप्रयच्छतः । तथा यशोऽस्य प्रथते धर्मश्चैव प्रवर्धते ।।
सर्वदा दान आदि का धन लेने वाला तथा इष्टपूर्त और दान आदि नहीं करनेवाला (ब्राह्मण) यज्ञ के दो या तीन अङ्गों की पूर्णता के लिए यदि याचना करने पर भी यजमान (यज्ञकर्ता) को धन नहीं दे तो यजमान उनको (बलात्कार या चोरी से) लावे, ऐसा कहने से धन लाने वाले यज्ञकर्ता की ख्याति और धर्म की वृद्धि भी होती है।
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