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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 138
दानेन वधनिर्णेकं सर्पादीनामशक्रुवन्‌ । एकैकशश्चरेत्कृच्छं द्विजः पापनुत्तये ।।
साँप आदि के वध का निवारण पूर्वोक्त (११।१३२-१३७) दोनों को करने में असमर्थ द्विज एक-एक पाप की निवृत्ति के लिए एक-एक कृच्छ (प्राजापत्य ११।२११) व्रत करे।
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