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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 132
अभ्रिं कार्ष्णायसीं दद्यात्सर्पं हत्वा द्विजोत्तमः । पलालभारकं षण्ढे सैसकं चैकमाषकम्‌ ।।
द्विजश्रेष्ठ साँप को मारकर काले लोहे का बना तीक्ष्णाग्र डण्डा तथा नपुंसक को मारकर एक भार (१ गाड़ी-२० मन) पुआल और एक मासा सीसा ब्राह्मण के लिए दान करे।
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