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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 13
योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्ञश्च सहस्रगुः । तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन्‌ ।।
जो ब्राह्मण या क्षत्रिय सौ यज्ञ करने योग्य धन होने पर भी अग्निहोत्र नहीं करता हो तथा एक सहस्र गौ या उतना धन होने पर भी सोमयज्ञ नहीं करता हो, ऐसे ब्राह्मण या क्षत्रिय के परिवार से (धनाभाव के कारण) यज्ञ दो या तीन अङ्गो से पूर्ण नहीं हो तो यज्ञकर्त्ता ब्राह्मण (बलात्कार या चोरी से) धन लावे।
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