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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 127
त्र्यब्दं चरेद्वा नियतो जटी ब्रह्महणो व्रतम्‌ । वबसन्दूरतरे ग्रामाद्वृक्षमूलनिकेतनः ।।
अथवा संयमी तथा जटाधारी होकर ग्राम से अधिक दूर पेड़ के नीचे निवास करता हुआ तीन वर्ष तक ब्रह्महत्या के प्रायश्चित्त को करे।
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