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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 123
जातिभ्रंशकरं कर्म कृत्वाऽ न्यतममिच्छया । चरेत्सान्तपनं कृच्छं प्राजापत्यमनिच्छया ।।
जातिभ्रंशकर कर्मो (११।६६) में से किसी एक को ज्ञानपूर्वक करने वाला , मनुष्य सान्तपन कृच्छर (११।२ ११) तथा अज्ञानपूर्वक करने वाला प्राजापत्य (११।२१०) व्रत को करे।
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