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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 122
तेभ्यो लब्धेन भैक्षेण वर्तयन्नेककालिकम्‌ । उपस्पृशंस्त्रिषवणमब्देन स विशुध्यति ।।
उन सात घरों से मिले हुए भिक्षान्न को एक शाम खाता हुआ तथा त्रिकाल (प्रातः, मध्याह तथा सायंकाल) स्नान करता हुआ वह “अवकीर्णी” एक वर्ष में शुद्ध (पापरहित) हो जाता है।
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