व्रती (ब्रह्मचर्य ब्रत वाले) का नियमानुष्ठान तथा वेदाध्ययन आदि से उत्पन्न तेज वायु, इन्द्र, गुरु तथा अग्नि, इन चारों के पास जाता है (अतएव इन चारों के उद्देश्य से “अवकीर्णी" को आहुति देने का पूर्व (११।१ १८) वचन से विधान किया गया है)।
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