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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 12
आह रेत्त्रीणि वाद्दे वा कामं शूद्रस्य वेश्मनः । न हि शूद्रस्य यज्ञेषु कश्चिदस्ति परिग्रहः ।।
यज्ञ दो या तीन अङ्गों से (धनाभाव के कारण) पूरा नहीं हो रहा हो तो, उसकी पूर्णता के लिए वैश्य के यहाँ से धन नहीं मिलने पर (बलात्कार या चोरी से धनवान्‌) शूद्र के यहाँ से धन लावे; क्योंकि शूद्र का यज्ञ से कोई सम्बन्ध नहीं होता है।
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