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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 118
हुत्वाऽग्नौ विधिवद्धोमानंततश्च समेत्यृचा । वातेनद्रगुरुवह्णीनां जुहुयात्सर्पिषाऽऽहुती: ।।
(पूर्व (११।११७) वचन के अनुसार काने गधे की चर्बी से) विधिपूर्वक 'निऋहति’ नामक देवता के उद्देश्य से हवनकर 'समासिञ्चन्‌ मरुतः........' इस मन्त्र से वायु, इन्द्र, गुरु तथा अग्नि के उद्देश्य से घी की आहुति देकर हवन करे।
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