एतदेव व्रतं कुर्युरुपपातकिनो द्विजाः ।
अवकीर्णिवर्ज शुद्ध्यर्थ चान्द्रायणमथापि वा ।।
अवकीर्णी (११।११९) छोड़कर शेष उपपातक (११।५८-६५) करनेवाला मनुष्य गोहत्या निवारक इसी (११।१०७-११४) ब्रत को करे अथवा चान्द्रायण ब्रत (११।२१५-२१८) को करे।
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