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मनुस्मृति • अध्याय 11 • श्लोक 112
उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम्‌ । न कुर्वीतात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ।।
गर्मी, वर्षा या शीत रहने पर या आँधी चलने पर यथाशक्ति गौ की विना रक्षा किये अपनी रक्षा न! करे।
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